Loud is fall of a tree, louder is the fall of a lion! But the loudest of all is, fall of haughty pride!!

चारों तरफ सन्नाटा! हमेशा अपने चरम पर रहने वाले शोरगुल को न जाने किसकी नज़र लग गई थी| कोने-कोने पर वर्षों से एक ही मुद्रा मे खड़ी मूर्तियों को भी लगा की आज उन्हे कई नये साथी मिल गए हैं | दिन हो या रात, हर समय चमकने वाले उस महल को आज मुश्किल से एक परिचित की शिनाख्त कर पाने लायक रोशनी से संतोश करना पड़ रहा था|
एक अत्यधिक आश्चर्यजनक घटना घटी| बुरी तरह हताश वह ‘महाराज’ अचंभित रह गया जब सन्नाटे और अंधेरे को एक साथ चीरती हुई ‘वह’ आई और वातावरण बदल सा गया| क्या वह कोई आकाशवाणी थी, कोई आत्मा या फिर भगवान का कोई रूप ? उसकी दिव्य रोशनी और अद्भुत संगीत पर कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था। महाराज को कुछ बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी, दूसरी तरफ से स्वयं ही आवाज आने लगी:
“जिस प्रकार सूर्य का उदय होना और अस्त होना एक दूसरे के पूरक हैं, जीवन का अंत मृत्यु के रूप में होना निश्चित है, उसी प्रकार अहंकार आपको सिर्फ अंधकार और विनाश की ओर ले जाएगा इस बात को कोई टाल नहीं सकता।”
वह आवाज वही नहीं थमी। “महाराज! मैं आपकी पूरी परेशानी से परिचित हूं, किस तरह आपके राज्य की लगभग पूरी जनसंख्या यहां से पलायन कर गई है। मुझे यह अच्छे से ज्ञात है आपके राज्य में पहले भी बहुत बड़ी बड़ी समस्याएँ आई हैं, एक बार जब पड़ोसी राज्य ने आपके राज्य पर हमला कर दिया था और उससे पहले एक बार जब आपके अपने भाई ने आपकी पुश्तैनी विरासत से अपना हिस्सा लेकर इस महल को छोड़ जाने की इच्छा जताई थी, उस समय भी खूब विनाश हुआ था। लेकिन इस बार बात कुछ और है क्योंकि-
शक्ति का कम होना विनाश की तरफ ले जाता है, अपनों का दूर होना भी विनाश की तरफ ले जाता है लेकिन सबसे बड़ा विनाश तब होता है जब तुम्हारा अहंकार तुम पर हावी हो जाए, जोकि इस स्थिति में हुआ है।आपका राज्य बहुत अच्छा था और यहां की प्रजा भी बहुत खुश थी। लेकिन जब आपको अपनी लोकप्रियता का घमंड होने लगा,लगने लगा कि जनता तो मूर्ख है, आप की नीतियां कैसी भी हो यह हमेशा आपके साथ रहेगी आपने उन सभी लोगों के खिलाफ कानून बनाने शुरू कर दिए जो बुद्धि, शरीर और काया में आपसे ज्यादा भाग्यशाली हों। नतीजतन आपका पूरा राज्य खाली होता चला गया।
सफलता और असफलता इस जीवन के दो पहलू हैं। आप सफल होने के बाद अहंकार का शिकार बने तो विनाश निश्चित है। प्रकृति का नियम है जो वस्तु जितनी तेज गति से ऊपर जाती है,उतनी ही गति से नीचे भी आती है। वह अपने साथ जितना अहंकार रुपी भार लेकर चलती है नीचे आने पर स्वयं पर उतनी ही जोर से चोट करती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सफल होना पाप है। एक हवाई जहाज भी ऊपर जाता है, बहुत तेज गति से जाता है, लेकिन वह अन्य किसी हीन वस्तु की भांति शिखर पर पहुंचते ही नीचे नहीं आ जाता, क्योंकि उसके पास कला है अपने भार (अहंकार) पर काबू पाने की। यदि आपके पास भी अहंकार पर काबू पाने की कला है आप जब तक चाहे शिखर पर रह सकते हैं, अन्यथा आप का विनाश ही होगा।
रावण में यदि किसी प्रकार की कोई कमी थी तो वह उसका अहंकार था। अहंकार के कारण अहंकार का रावण से बढ़कर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। कलयुग में इसका सबसे बड़ा उदाहरण टाइटैनिक के रूप में है। जिस जहाज को नष्ट करना असंभव होने का दावा किया जाता था उसका भी विनाश हुआ तो सिर्फ अहंकार के कारण। इन सभी उदाहरणों से भी स्पष्ट है अहंकार से बड़ा विध्वंसकारी कुछ नहीं होता।”

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