“घड़ी”

वो भी एक घड़ी थी, अपनी सखियों के संग मैं पर्दे के पीछे पड़ी थी। एक अजनबी की तलाश मे हर क्षण साठों बार नजरें घुमाती  थी। यह तो साई को भी सताई जब मुझ पर गर्द जम आई, एक दिन मेरा श्वेत रंग देखते ही मैं तुम्हे भाई। हर परिमाप पर परखने के बाद, सबके… Continue reading “घड़ी”